जानिये इस्लाम में हज और उमराह करने की क्या है हदीस, अल्लाह ने क्या किया बयान

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इस्लाम में यह काम करने से गुनाह ऐसे मिट जाते हैं, जैसे भट्टी लोहे के मैल को खत्म कर देती है अल्लाह ताला ने अपने बंदों पर जो काम ज़रूरी किए हैं, उन में से ज़कात और हज भी हैं, लेकिन यह दोनों काम करना सभी मुसलमानों पर ज़रूरी नहीं है, बल्कि ज़कात के लिए एक हद बनाई गई,अगर हद से ज़्यादा दौलत किसी के पास है तो साल में माल का ढाई फीसद हिस्सा गरीबों का हो जाता है,

अगर कोई यह माल गरीबों को नहीं देता है, तो कयामत के दिन अल्लाह ताला की जानिब से इस माल के बारे में सवाल किया जाएगा, और हिसाब किताब लिया जाएगा,कि यह माल उस ने क्या किए, वहीं जो लोग ज़कात नहीं निकालते हैं, उनके माल में बरकत नहीं होती है, और धीरे धीरे उनका सारा माल खत्म हो जाता है।

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इसी तरीके से मुसलमान पर हज करना भी फर्ज़ किया गया है, लेकिन यह भी सारे मुसलमानों पर फर्ज़ नहीं है,बल्कि सिर्फ उन्हीं मुसलमानों पर फर्ज़ किया गया है, जो लोग मक्का शरीफ जाने की ताक़त रखते हों,

और यह ताक़त माल और जिस्म दोनों से हो, अगर किसी के पास इतना माल नहीं है कि अपने घर वालों को खिलाने पिलाने के बाद वह मक्का शरीफ जा सके, तो ऐसे इंसान पर हज करना फर्ज़ नहीं है।

इबने माजा की एक हदीस है कि अल्लाह के नबी ने फरमाया हज और उमरा किया करो क्यूंकि बार बार हज और उमरा करना गरीबी और गुनाहों को ऐसे खत्म कर देता है जैसे भट्टी लोहे के मैल को खत्म कर देती है|

इस हदीस से पता चलता है कि हज करने से अल्लाह ताला गुनाहों को माफ कर देता है, और गुनाहों से महफूज भी रखता है, इस लिए जो लोग मक्का शरीफ जाने की ताक़त रखते हैं, वह हज पर ज़रूर जाएँ।

वहीं जो लोग इतना माल रखते हैं कि साल में ज़कात निकाल सकें, तो ऐसे लोगों को ज़रूर ज़कात निकाल कर गरीबों को देना चाहिए।

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