क्या प्यार में ‘जिन्ना’ जायज है ? जाने हज़रात ईमाम अली ने क्या कहा…

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मोहब्बत करना या मोहब्बत हो जाना कोई नई बात नहीं है। जब से दुनिया बनी है तब से मोहब्बत और नफरत दोनों का ही अपना अपना वजूद रहा है। मोहब्बत हमारे नबी पाक के जमाने से चली आ रही हैं, और उस जमाने में मोहब्बत की डेफिनेशन कुछ और ही थी। यह अलग बात है आज के दौर में लोगों ने मोहब्बत के डेफिनेशन को ही बदल दिया है।

आज के दौर में ज्यादातर लोग जिस्मानी तालुक रखने को ही मोहब्बत समझने लगे हैं। जिसके के वजह से न जाने कितनी ही ज़िन्दगी बर्बाद हो गई है। आज हम को बताएंगे कि आखिर असल में मोहब्बत किसे कहते हैं? जैसे कि सब जानते हैं, प्यारे नबी मोहम्मद साहब ने हज़रत अली साहब को इल्म का दरवाजा कहा है। जिससे जो मसला होता वह अपनी परेशानी लेकर हज़रत अली के पास आते। हज़रत अली सब को उनके परेशानी का हल देते। एक बार का वाक़्या है कि एक औरत आप हज़रत अली के पास एक सवाल लेकर आई।

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औरत ने कहा कि मुझे आपसे अपने एक सवाल का जवाब चाहिए, तब हज़रत अली फरमाते है कि पूछो तुम्हे क्या पूछना है, मुझे मेरे प्यारे नबी ने इल्म का दरवाजा कहा है, इसलिए कहा क्योंकि जब कोई इंसान अपने किसी भी सवाल से मायूस हो जाये परेशान हो जाये तो मैं उसे उस सवाल का जवाब देकर उसकी परेशानी दूर करू। उन्होंने कहा ए औरत पूछो क्या पूछना चाहती हो?

आपकी सब बात सुन कर वह औरत ने अपना सवाल किया। उसने पूछा या अली एक सख्स मुझसे बेहिसाब मोहब्बत करता है, मुझसे बहुत प्यार करता है। लेकिन वह मुझे छूने की कोशिश करता है। अपने जिनशी तमन्ना को पूरा करने के लिए मुझसे मिलने की कोशिश करता है। फिर उसने कहा मुझे बताये क्या मेरी मोहब्बत मेरा गुनाह है…?

सब बात सुनने के बाद हज़रत अली ने फरमाया ए औरत याद रखना मोहब्बत का तालुख जिस्मानी तालुकात रखने से बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि मोहब्बत का तालुख तो रूह के सुकून से है। और यह सुकून तब हासिल होती जब आप अपने मोहब्बत के अंदर खुद के वजूद को भी फना कर दे। ए औरत याद रखना मोहब्बत की पहली सीढ़ी इज़्ज़त हैं।

अल्लाह की जात ने मोहब्बत का दूसरा नाम इज़्ज़त कहा है। इसके साथ ही यह भी याद रखना अगर जो सख्स तुमसे मोहब्बत करता है लेकिन जमाने के सामने तुम्हे अपनाने से डरता है। तो वह मोहब्बत, मोहब्बत नहीं।

और इसके यह भी याद रखना जिस मे मोहब्बत जिस्मानी तमन्ना रखी जाए, जिसमें दुनिया का हिस्रो लालच शामिल हो वह मोहब्बत नही है। मोहब्बत का तालुख रूह के सुकून से है, जमाने के सामने अपने मोहब्बत को अपनाने से है और एक दूसरे की इज़्ज़त से है।

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