Dange Subha wali bechaini
Dange Subha wali bechaini

फिरदौस खातून

पता नहीं आपलोगों को कैसा लगता है जब आपलोग दंगों और मारकाट की ख़बर सुनते हैं। मेरा तो ख़ून ठण्डा होकर मानो जम जाता है। पता नहीं किस शून्य काल में मेरा मन विचरण करने लगता है, ज़ेहनो दिल अजीब सी कशमकश में फँस कर रह जाता है। न दिमाग़ कुछ सोच पाता है और न ही दिल कोई फ़ैसला कर पाता है। दिल की धड़कनें तो तेज़ होती हैं लेकिन समय रुक सा जाता है। कैसे इंसान अलग अलग वर्गों में बँटकर इतना वहशी हो जाता है कि दूसरा वर्ग उन्हें वैसा आदमख़ोर जानवर नज़र आने लगता है जिसके अस्तित्व को बस किसी तरह ख़त्म कर देना ही पहले वर्ग का एकमात्र मकसद बन कर रह जाता है। भले ही इस क्रम में पहले झुण्ड(वर्ग) के 2-4 जानवरों(लोगों) को अपनी जान से हाथ धोना पड़े लेकिन अगर दूसरे झुण्ड का एक भी जानवर बचा तो मानो पहले झुण्ड की आने वाली सारी नस्लों को भी ख़तरा है।

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कैसी चिढ़ है ये इंसानों के बीच, कैसी कुरूपता है ये सामाजिक संरचना की, आपसी मेलजोल की, विचारों की ये कैसी नफ़रत है जो निष्क्रिय पड़े समाज को अचानक से बारूद का विस्फ़ोटक ढ़ेर बना देती है। क्या है ये धर्म ज़ाति क्षेत्र का चश्मा जिसे पहनकर लोग, लोग नहीं हैवान बन जाते हैं।

मुझे सिर्फ बच्चों के स्कूलों या बसों पर हमला किये जाने से तकलीफ़ नहीं होती, या किसी महिला से बलात्कार के बाद उसके पेट से बच्चे को निकाल कर पटक देने की ख़बर मुझे बेचैन नहीं करती। मैं उस शख़्स के लिए भी परेशान और बेचैन होती हूँ जो भगवा पहन कर जय श्री राम का नारा लगाते हुए दसों को मार चुका होता है और अंत में किसी दाढ़ी वाले की तलवार उसे भी हलाक़ कर देती है। मुझे इस बात से बहुत तकलीफ़ होती है कि किसी ग़रीब की कमाई के एकमात्र ज़रिया उसके ठेले को तोड़ दिया जाता है। मेरा आत्म सम्मान मुझे कचोटने लगता है कि मैं ऐसे समाज का हिस्सा हूँ जहाँ नफरत और ख़ुदगर्ज़ी का ये आलम है कि एक ग्रुप की ख़ून पसीने की कमाई, उसकी दुकानों, उसके घरों, उसके ईबादतगाह को पल भर में मलबे का ढ़ेर बना दिया जाता है।

मेरा मन बस इसी उलझन में रहता है कि क्या हम इंसान बस इंसान बन कर नहीं रह सकतें? ग्रुप्स में भी बँटना है तो बँटे लेकिन इसलिए कि जान पाएँ कौन हमसे कमज़ोर है जिसकी हमें मदद करनी चाहिए कौन है जिसे आगे आने के लिए अभी और ज़्यादा संसाधनों की ज़रूरत है न कि इसलिए कि भैया हम बड़े हैं, ताक़तवर हैं तो सबपर हमारा एकाधिकार हो।

उलझन में हूँ बेचैनी और दिमागी पशोपेश के बीच फँसी क्या करूँ कि कुछ तो ठीक हो जाए.. मेरी surrounding, मेरा समाज मेरे रहने के लायक़ कैसे कर पाऊंगी मैं.

सुबह वाली बेचैनी

(फिरदौस खातून सोशल मीडिया की एक्टिव यूजर है, ये लेख उनके फ़ेसबुक पोस्ट से लिया गया है)

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