BJP government targeting Muslim
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जब खट्टर ये कह रहे थे कि नमाज़ सिर्फ मस्जिद और ईदगाह में होनी चाहिए, तब वो संयुक्त हिन्दू संघर्ष समिति का नज़रिया पेश कर रहे थे। ये वही संगठन है जो पिछले दो हफ़्तों से नमाज़ पढ़ने में बाधा डाल रहा है।

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इस संगठन की ये मांगें हैं: हिन्दू इलाकों में नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, सिर्फ वहीं अनुमति दी जाए जहाँ मुसलमानों की संख्या 50% से ज़्यादा हो।

भाजपा मंत्री अनिल वेजल ने इसमें एक और नया पहलू ये कहकर जोड़ दिया कि ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के लिए नमाज़ की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अपने दक्षिणपंथी दोस्तों की तरह मैं एक आलोचना का जवाब दूसरी आलोचना करते हुए ये नहीं कहूँगी कि कांवड़ यात्रा से किस तरह की परेशानियाँ होती हैं, कैसे गणपति विसर्जन के कारण मुंबई का पानी दूषित होता है बल्कि इसके बजाए मैं संविधान के अनुच्छेद 25 को दोहराना चाहूंगी जो कहता है कि भारत के सभी लोगों के पास धर्म का अभ्यास और प्रचार करने की आज़ादी है बस वो कानून का उलंघन ना करे और नैतिकता और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ना हो।

चलिए दो साल पहले 2016 में चलते हैं, जब जैन गुरु तरुण सागर ने निर्वस्त्र होकर हरियाणा की विधानसभा में 40 मिनट का भाषण दिया था। अगर ये धर्म की आज़ादी में आता है, तो कैसे शांतिपूर्ण नमाज़ उस आज़ादी का हिस्सा नहीं है।

अब आते हैं हिन्दू संयुक्त संघर्ष समिति की मांगों पर, जिसे सीएम खट्टर ने समर्थन भी दिया। इन मांगों का लक्ष्य साफ़ दिखाई देता है, अगर किसी हिन्दू बहुसंख्यक इलाके में मुस्लिम रहते हैं तो ये मांगें उन्हें दब कर रहने और वहां से चले जाने पर मजबूर कर देंगी। भारत में ये बात छुपी नहीं है कि अल्पसंख्यकों को आसानी से घर किराय पर नहीं दिए जाते हैं और ये बात अलिखित नए जनगणना के आकड़ो में खुलकर सामने आती है।

पूरे देश में अल्पसंख्यक विरोधी सोच और घृणा 2014 से लगातार बढ़ रही है। अगर सत्तारूढ़ पार्टी ने इसके लिए लोगों को उकसाया भी नहीं है तो उन लोगों को आज़ादी तो ज़रूर दी है जो इस सब में लिप्त हैं। अगर लोग ये भी कहे कि अल्पसंख्यकों के प्रति अपराध के आकड़े अचानक ज़्यादा नहीं बढ़े हैं तो इन अपराधों के प्रति एक चुप समर्थन को नज़रान्दाज़ नहीं किया जा सकता है।

वर्तमान सरकार ने अल्पसंख्यकों के विरुद्ध अपराध करने वाले लोगों के सामने खुद को झुका दिया है। हाँ, ये देश अल्पसंख्यकों के प्रति कभी दयालु नहीं था लेकिन जो अब हो रहा है वो दु:खमय नहीं बल्कि डराने वाला है।

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ये डर तब और बढ़ जाता है जब सरकार उन लोगों को समर्थन करती है जो खुद को कानून समझते हैं और नमाज़ पढ़ने वालों को परेशान करते हैं। जब इस संबंध में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया तो हिन्दू संघर्ष समिति ने उनकी रिहाई और नमाज़ पर प्रतिबन्ध के लिए प्रदर्शन करा। सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस तरह की चीज़ों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने के बजाए डरे-सहमें अल्पसंख्यकों को ऐसे ही छोड़ दिया।

पिछले कुछ सालों से अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा बढ़ी है लेकिन मुस्लिमों ने इसे सबसे ज़्यादा सहा है। मुस्लिमों के प्रति सभी तरह के अपराधों को ये कहकर सही ठहराने की कोशिश की जाती है कि ‘वो भारतीय नहीं हैं या ये उनका देश नहीं है।’ जबकि ये गलत है, वो भारतीय हैं और ये उनका देश है।

एक ऐसी दुनियां में जहाँ सरकारें शांति स्थापित करने की जगह अपने फायदे के लिए सांप्रदायिक घृणा को बढ़ावा दे रही हैं। तब शायद वो बुद्धिजीवी, नास्तिक, आलोचनात्मक लोग ही हैं जिन्होंने अभी भी विश्व को सुरक्षित रख रखा है। हमारी आवाज़ उतनी तेज़ नहीं है और कभी कभी एम.एम. कलबुर्गी की तरह दबाती भी जाती है। लेकिन फिर भी यही वो लोग हैं जो इस दुनियां को तसल्ली देते हैं जहाँ विश्वास एक हथियार बन गया है।

ये हरिन्ध कौर के अंग्रेज़ी लेख का हिंदी में अनुवाद है।

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