Modi govt defends NPA defaulters
Modi govt defends NPA defaulters

Modi govt defends NPA defaulters

देश के बैंकों के लिए नॉन परफोर्मिंग एसेट्स (NPA) अभिशाप बनता जा रहा है। इसके बावजूद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस पर कार्रवाई नहीं चाहती है। ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार अपने करीबी उद्योगपतियों को बचाने में लगी हुई है।

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जानकारी के मुताबिक, एन.पी.ए बैंकों का वो लोन होता है जिसके वापस आने की उम्मीद नहीं होता। इस कर्ज़ में 90% से ज़्यादा हिस्सा उद्योगपतियों का है। अक्सर उद्योगपति बैंक से कर्ज़ लेकर खुद को दिवालिया दिखा देते हैं और उनका लोन एन.पी.ए में बदल जाता है। यही उस लोन के साथ होता है जिसे बिना चुकाए नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग देश छोड़कर भाग जाते हैं।

न्यूज वेबसाइट बोलता यूपी.कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, केन्द्रीय मंत्री पियूष गोयल ये चाहते हैं कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) अपने उस ‘सर्कुलर’ को वापस लेले ताकि उद्योगपतियों को बैंकों से लिया लाखों करोड़ का कर्ज़ चुकाना ना पड़े। बता दें कि आरबीआई के इस ‘सर्कुलर’ से उद्योगपतियों को लाखों का कर्जा चुकाना पढ़ सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल, आरबीआई ने 12 फरवरी को एक सर्कुलर जारी किया था। उसके मुताबिक, जिन उद्योगपतियों का बैंक लोन एन.पी.ए में बदल चुका है उन्हें 1 मार्च 2018 से 30 सितम्बर तक का समय लोन चुकाने के लिए दिया गया है। जिन उद्योगपतियों को ये समय दिया गया है उन पर 2.5 लाख करोड़ का कर्ज़ है|

Modi govt defends NPA defaulters

अगर वो समयसीमा में अपना लोन नहीं चुकाते हैं तो 1 अक्टूबर से उनपर कार्रवाई शुरू हो जाएगी। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में उन पर मुकदमा चलाया जाएगा।

मोदी सरकार जो ‘नोटबंदी’ कर ये कहती है कि उसे देश के हित के लिए कड़ा रुख अपनाना सही लगता है। उसे आरबीआई की ये कार्रवाई कड़ी लग रही है।

‘द वायर’ की खबर के मुताबिक, इसी हफ्ते केंद्रीय मंत्री पियूष गोयल ने आरबीआई अधिकारीयों से मीटिंग में कहा कि वो चाहते हैं कि आरबीआई अपना सर्कुलर वापस ले ले और उद्योगपतियों को और अधिक समय दे। लेकिन आरबीआई ने सर्कुलर वापस लेने से मना कर दिया है।

केंद्र सरकार उद्योगपतियों पर इतनी दया तब दिखा रही है जब इनके एन.पी.ए कारण बैंकों का घाटा बढ़ता जा रहा है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सामूहिक शुद्ध घाटा 2017-18 में बढ़कर 87,357 करोड़ रुपये हो गया। ये भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा है। यह इतनी बड़ी रकम है कि हर भारतीय को लगभग 670 रुपए मिल सकते थे।

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