इंग्लेंडः 50 पौंड पर टीपू सुल्तान की वंशज नूर इनायत खान की फ़ोटो छाप रहा है बैंक ऑफ इंग्लैंड,जानिए पूरा मामला?

Tipu Sultan Relative on Pound

नई दिल्ली – बैंक ऑफ इंग्लैंड ने 50 पाउंड की नई करेंसी छापने की घोषणा की है जिसमें वो अपने पूर्व क्रांतिकारियों की फ़ोटो छापकर उन्हें श्रद्धांजलि देने चाहते हैं,भारत के सबसे बहादुर बादशाह शेर मैसूर टीपू सुल्तान की वंशज नूर इनायत खान की फ़ोटो को भी शामिल किया गया है। बैंक ऑफ इंग्लैंड ने हाल ही में 2020 से प्रिंट में जाने के लिए बड़े मूल्य नोट के नए बहुलक संस्करण की योजना की घोषणा की थी और संकेत दिया था कि यह नए अक्षरों पर संभावित पात्रों के लिए सार्वजनिक नामांकन आमंत्रित करेगा।

Haider ali tipu
Haider ali tipu

इस हफ्ते के शुरू में शुरू किए गए अभियान के पक्ष में एक ऑनलाइन याचिका ने बुधवार तक 1,200 से अधिक हस्ताक्षरों को आकर्षित कर लिया है, खान को पहली जातीय अल्पसंख्यक ब्रिटिश महिला माना जाता है। बता दें की नूर का जन्म 1914 में मॉस्को में हुआ था लेकिन उनकी परवरिश फ्रांस में हुई और वे रहीं ब्रिटेन में। उनके अब्बा हिंदुस्तान से थे और सूफी मत को मानते थे। उनकी मां अमरीकन थीं लेकिन उन्होंने भी बाद में सूफी मत को अपना लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के समय से परिवार पेरिस में रहता था।

Tipu Sultan Tank
Tipu Sultan Tank

लेकिन जर्मनी के हमले के बाद उन लोगों ने देश छोड़ने का फैसला किया। श्राबणी बसु नूर इनायत खान की याद में एक संगठन भी चलाती हैं। उन्होंने बताया, “नूर एक वालंटियर के तौर पर ब्रितानी सेना में शामिल हो गईं। वह उस देश की मदद करना चाहती थीं जिसने उन्हें अपनाया था। उनका मकसद फासीवाद से लड़ना था।”

बाद में वो एयरफोर्स की सहायक महिला यूनिट में भर्ती हो गईं। ये 1940 की बात है। फ्रेंच बोलने में उनकी महारत ने स्पेशल ऑपरेशन एग्जिक्यूटिव के सदस्यों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस गुप्त संगठन को ब्रितानी प्रधानमंत्री चर्चिल ने बनाया था जिसका काम नाजी विस्तारवाद के दौरान यूरोप में छापामार कार्रवाई को बढ़ावा देना था।

खुफिया अभियान

महज तीन साल के भीतर 1943 में नूर ब्रितानी सेना की एक सीक्रेट एजेंट बन गईं। श्राबनी बसु कहती हैं कि नूर एक सूफी थीं, इसलिए वे हिंसा पर यकीन नहीं करती थीं लेकिन उन्हें मालूम था कि इस जंग को उन्हें लड़ना था। नूर की विचारधारा की वजह से उनके कई सहयोगी ऐसा सोचते थे कि उनका व्यक्ति खुफिया अभियानों के लिए उपयुक्त नहीं है।

एक मौके पर तो उन्होंने यह भी कह दिया कि मैं झूठ नहीं बोल सकूंगी। बसु बताती हैं, “ये बात किसी ऐसे सिक्रेट एजेंट की जिंदगी का हिस्सा नहीं हो सकती हैं जो अपना असली नाम तक का इस्तेमाल न करता हो और जिसके पास एक फर्जी पासपोर्ट हो।”

ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स के दस्तावेजों के मुताबिक इसके बावजूद नूर के आला अफसरों को लगता था कि उनका किरदार एक दृढ़ इरादे वाली महिला का है। उन्हें जो जिम्मेदारी दी गई, वो बहुत खतरनाक किस्म की थी। नूर को एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन किया गया और जून, 1943 में उन्हें फ्रांस भेज दिया गया।

Noor Inayat Khan
Noor Inayat Khan

इस तरह के अभियान में पकड़े जाने वाले लोगों को हमेशा के लिए बंधक बनाए जाने का खतरा रहता था। जर्मन सीक्रेट पुलिस ‘गेस्टापो’ इन इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स की पहचान और इनके स्रोत को पकड़ सकती थी। बसु के मुताबिक उनकी खतरनाक भूमिका को देखते हुए कई लोग मानते थे कि फ्रांस में वह छह हफ्ते से अधिक जीवित नहीं रह पाएंगी। नूर के साथ काम कर रहे दूसरे एजेंटों की जल्द ही पहचान कर ली गई। उनमें से ज्यादातर गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन नूर फरार होने में कामयाब रहीं।

इसके बाद भी जर्मन पुलिस की नाक के नीच नूर ने फ्रांस में अपना ऑपरेशन जारी रखा। लेकिन अक्टूबर, 1943 में नूर धोखे का शिकार हो गईं। श्राबनी बसु कहती हैं, “उनके किसी सहयोगी की बहन ने जर्मनों के सामने उनका राज जाहिर कर दिया। वह लड़की ईर्ष्या का शिकार हो गई थी क्योंकि नूर हसीन थीं और हर कोई उन्हें पसंद करता था।”

इसके बाद जर्मन पुलिस ने उन्हें एक अपार्टमेंट से गिरफ्तार कर लिया। लेकिन नूर ने आसानी से सरेंडर नहीं किया। वह लड़ीं और बसु के मुताबिक छह हट्टे-कट्टे पुलिस अधिकारियों ने मिलकर उन्हें काबू में किया। दो मौकों पर उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाईं। जर्मन एजेंटों ने ब्रितानी ऑपरेशन के बारे में जानकारी निकलवाने के लिए नूर को बहुत प्रताड़ित किया।

लेकिन नूर अपने नोटबुक्स नष्ट नहीं कर पाई थीं और इससे मिली जानकारी के आधार पर जर्मनों ने कुछ ब्रितानी एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया। कैदी के रूप में एक साल गुजारने के बाद उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यातना शिविर में भेज दिया गया जहां उन्हें नए सिरे से प्रताड़ित किया गया। बाद में नाजियों ने उन्हें तीन अन्य महिला जासूसों के साथ गोली मार दी।

मौत के वक्त उनकी उम्र महज 30 साल थी। इस घटना के साक्षियों का कहना है कि मौत के वक्त उन्होंने आजादी का नारा दिया था। नूर की बहादुरी को उनकी मौत के बाद फ्रांस में ‘वॉर क्रॉस’ देकर सम्मानित किया गया। ब्रिटेन में उन्हें क्रॉस सेंट जॉर्ज दिया गया। अब तक केवल तीन और महिलाओं को इस सम्मान से नवाजा गया है।

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Mughals Law India

कहा जाता है कि अगर आप कोई भी काम सच्ची लगन और ईमानदारी से करते हैं। तो सभी मुश्किलों को पार करते हुए आप अपनी मंजिल तक जरूर पहुंचते हैं। बशर्ते आप में आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति की कमी बिल्कुल भी ना हो इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि यारमुक का युद्ध जो कि आज से सदियों पहले हुआ था आपको बता दें कि यरमूक का युद्ध बीजान्टिन साम्राज्य की सेना और रशीदून खिलाफत की मुस्लिम अरब लीग सेना के बीच हुआ था।

यारमुक का युद्ध रहा सबसे चर्चित जंग

यह युद्ध 6 मार्च 636 ईसवी में प्रमुख नदी के पास लड़ा गया था जो कि 6 दिनों तक चला था इस युद्ध में सहाबी-ए-रसूल अबु उबैदा मुसलमानों के सिपहसालार थे। बताया जाता है कि जब रोमनों ने मुसलमानों पर हमला किया तो खालिद बिन वलीद ने अपने 60 आदमियों के साथ 60 हजार की फौज को खड़ा किया था।

60 हजार की फ़ौज से लड़े थे 60 सैनिक

दरअसल 60000 सैनिकों की फौज के आगे 60 आदमियों को खड़ा करना बहुत ही मुश्किल काम था लेकिन उन्होंने अपनी एकता विश्वास और इच्छाशक्ति की बदौलत 60 आदमियों के साथ ही उस 60000 सैनिकों की सेना को हरा दिया।

इस तरह वहां पर रोमनों शासन पूरी तरह से खत्म हो गया। बाकी बचे लोग वहां को छोड़कर चले गए।

आत्मविश्वास की बदौलत जीती जंग

बताया जाता है कि जबला बिन ऐहम गस्सानी साठ हज़ार सवारों को लेकर मैदान में उतरे तो उन्हें आता देख मुजाहिद ओने फ़ौरन हजरत अबू उबैदा को इस बारे में इतना की और हज़रत अबू उबैदा रजियल्लाहु अन्हु ने मुजाहिदों को बुलाया और निडर होकर मैदान में जाने का आदेश दिया।

2000 सैनिकों के बराबर था एक

इसके बाद सभी मुजाहिद अपने हजारों और घोड़ों को लेकर मैदान में पहुंच गए बताया जाता है कि हज़रत अबू सुफियान रजियल्लाहु अन्हु इतनी बड़ी सेना से इसलिए लड़ पाए। क्योंकि उनका कहना था| 30 आदमीयों को लेकर 60 हजार से लडने का इरादा रख़ते हैं। क्योंकि हमारे 1 सैनिक 2000 के बराबर है। उनकी ये बात सुनकर सब चौंकाने रह गए।