राफेल पर बुरी फंस गई मोदी सरकार ! अब कांग्रेस ने CAG का दरवाजा खटखटाया, कहा- घोटाले की जांच हो

Congress Leader meets CAG for Rafale Scam

राफेल मामला 2019 चुनाव में मोदी सरकार के विरुद्ध प्रमुख मुद्दा बन सकता है। विपक्ष ने इस मामले में पूरी तरह से सक्रीय नज़र आ रहा है। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने बुधवार को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से मुलाकात कर विस्तृत जांच की मांग की है।

राफेल डील को लेकर कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार पर कुछ महीनों से हमले तेज कर दिए हैं। कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के सीएजी से मुलाकात के बाद कांग्रेस पार्टी नेता आनंद शर्मा ने कहा, हमने इनक्लोजर के साथ-साथ विस्तृत ज्ञापन सीएजी को सौंपा है जिससे स्पष्ट होता है कि राफेल खरीद में अनियमितता हुई हैं। उम्मीद है इस मामले में सीएजी जांच करेंगे।

इससे पहले पूर्व रक्षा मंत्री और कांग्रेस नेता एंटनी ने सीतारमण से पूछा था कि अगर केंद्र सरकार की ओर से खरीदा जा रहा विमान वाकई सस्ता है तो उसने 126 की बजाए 36 ही विमान क्यों खरीदे। इस पर उन्होंने कहा, ‘विमान खरीदना कोई साधारण खरीद प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए एक तय प्रक्रिया है।’

Congress Leader meets CAG for Rafale Scam
Congress Leader meets CAG for Rafale Scam

क्या है विवाद
राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी बनाएगी।

जबकि अनिल अम्बानी की कंपनी को विमान बनाने का कोई अनुभव नहीं है क्योंकि ये कंपनी राफेल समझौते के मात्र 14 दिन पहले बनी है। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

यशवंत सिन्हा का आरोप- PM मोदी ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर खुद ही ‘राफेल डील’ को तय किया

Yashwant Sinha attacks PM Modi on Rafale Deal

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा आरोप लगाया है। कथित राफेल घोटाले को लेकर यशवंत सिन्हा ने कहा है कि पीएम मोदी ने विशेष कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए अपने सभी अधिकारों से आगे जाते हुए इस समझौते को खुद तय किया है।

बोलता हिंदुस्तान से राफेल डील पर बात करते हुए पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि जब हम लोग इस मामले की तय में गए तो बहुत सारे चौकाने वाले तथ्य सामने आए। और तब ही हमने तय किया कि हम इस मामले को देश की जनता के सामने रखेंगे।

उन्होंने कहा कि देश में बोफोर्स घोटाले के बाद रक्षा सौदों में कड़े नियमों का पालन किया जाता रहा है लेकिन मोदी सरकार ने राफेल सौदें में सभी नियमों की धड़ल्ले से उपेक्षा की है।

उन्होंने सरकार पर देश की रक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस सौदे में पहले फ़्रांस की ‘डासौल्ट’ कम्पनी के साथ मिलकर भारत की सरकारी कंपनी एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) विमान बनाने वाली थी।

लेकिन इस 50 वर्षीय अनुभव वाली कंपनी को हटाकर अनिल अंबानी की 14 दिन पुरानी कंपनी को इसकी जगह दे दी गई।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि पीएम मोदी ने फ़्रांस जाकर अपने स्तर पर राफेल विमान खरीदने के लिए नया सौदा तय किया।

इसके लिए उन्होंने रक्षा विभाग और रक्षा समितियों की इजाज़त नहीं ली जो कि किसी भी रक्षा सौदे को तय करने के लिए अनिवार्य है। उनको इस तरह से रक्षा सौदा तय करने का अधिकार नहीं है लेकिन उन्होंने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाते हुए इसको तय किया।

क्या है विवाद
राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी बनाएगी।

जबकि अनिल अम्बानी की कंपनी को विमान बनाने का कोई अनुभव नहीं है क्योंकि ये कंपनी राफेल समझौते के मात्र 14 दिन पहले बनी है। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

 

Source: boltaup.com

राफेल घोटालाः सुप्रीम कोर्ट के वकील का दावा, ‘राफेल डील में अनिल अंबानी को मिली 21 हजार करोड़ की दलाली’

Once again prashant bhushan exposed rafale

नई दिल्ली – राफेल डील मोदी सरकार के लिये एक के बाद एक समस्याएं खड़ी कर रही है। बीते शनिवार को देश के जाने माने वकील वकील प्रशांत भूषण ने दावा किया कि राफेल लड़ाकू विमान सौदा ‘‘इतना बड़ा घोटाला है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते’’। प्रशांत ने आरोप लगाते हुए कहा कि आफसेट करार के द्वारा अनिल अम्बानी के रिलायंस समूह को ‘‘दलाली (कमीशन)’’ के रूप में 21,000 करोड़ रुपये मिले। उन्होंने इस सौदे से जुड़ी कथित दलाली की 1980 के दशक के बोफोर्स तोप सौदे में दी गई दलाली से तुलना की। बता दें कि अनिल अंबानी ने इससे पहले आरोप से इनकार किया था।

Once again prashant bhushan exposed rafale
Once again prashant bhushan exposed rafale

प्रशांत भूषण ने कहा कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने सिर्फ सौदे में अनिल अम्बानी की कंपनी को जगह देने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया, भारतीय वायु सेना को बेबस छोड़ दिया। प्रशांत ने कहा, राफेल सौदा इतना बड़ा घोटाला है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बोफोर्स 64 करोड़ रुपये का घोटाला था जिसमें चार फीसद कमीशन दिया गया था। इस घोटाले में तो कमीशन कम से कम 30 फीसद है। अनिल अम्बानी को दिए गए 21,000 करोड़ रुपये सिर्फ कमीशन हैं, कुछ और नहीं।

राफेल सौदे के बाद लड़ाकू विमानों की आपूर्ति करने वाली फ्रांसीसी कंपनी दसाल्ट ने भारतीय कंपनियों के लिए व्यापार के सृजन के दायित्वों का पालन करने के लिए रिलायंस ग्रुप के साथ एक संयुक्त उद्यम शुरू किया। भूषण ने पूछा कि वायुसेना को 126 विमानों की जरूरत थी और उसने किस तरह अपनी जरूरत ‘‘कम की’’ और नये सौदे से तकनीक वाली उपधारा ‘‘गायब’’ होने पर सवाल किए।

प्रशान्त भूषण ने कहा कि सरकार और अम्बानी मिलकर राफेल पर झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री ने जो किया वह ‘क्रिमिनल मिसकन्डक्ट’ है। राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार हुआ और दलाली खाई गई। सरकारी खजाने का कम से कम 21000 करोड़ का नुकसान हुआ। अम्बानी को यह फायदा पहुंचाया गया। यह विमान सौदा देश की सुरक्षा से जुड़ा है। असली देशभक्त इसपर सवाल उठाएंगे और असली देशद्रोही झूठ फैलाएंगे।

राफेल विमान घोटाले का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, अब सर्वोच्च अदालत को कैसे झांसा देगी मोदी सरकार ?

Supreme Court will start hearing next week on Rafale Deal

विवादित राफेल विमान समझौते पर अब मोदी सरकार घिरती जा रही है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस पर सुनवाई करने का फैसला ले लिया है। इस डील को रद्द करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट का ये रुख भाजपा के लिए चुनाव में महंगा पड़ सकता है। क्योंकि अब तक सिर्फ विपक्ष इस मुद्दे को उठा रहा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इसमें शामिल होने घोटाले आरोपों को आधार देता है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि इस पर अगले हफ्ते सुनवाई होगी। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अधिवक्ता एम एल शर्मा की इस बारे में दलीलों पर गौर किया कि उनकी अर्जी तत्काल सुनवायी के लिए सूचीबद्ध की जाए।

शर्मा ने अपनी अर्जी में फ्रांस के साथ लड़ाकू विमान सौदे में विसंगतियों का आरोप लगाया है और उस पर रोक की मांग की है। शर्मा की याचिका में राफेल सौदे को रद्द करने, कथित अनियमितताओं के कारण प्राथमिकी दर्ज करने और कानूनी कार्रवाई के आदेश देने का अनुरोध न्यायालय से किया गया है।

क्या है विवाद
राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए 2016 में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी बनाएगी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

Source: boltaup.com

फ्रांस की मीडिया ने किया बड़ा खुलासा : ‘राफेल समझौते’ के दौरान PM मोदी के साथ फ्रांस में मौजूद थे अनिल अंबानी

Ambani was present in france with PM Modi

फ्रांस के प्रमुख अखबार फ्रांस 24 ने राफ़ेल डील को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। अखबार ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि आखिर कैसे इस डील से भारत की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को बाहर करते हुए निजी क्षेत्र की रिलायंस डिफेंस को शामिल किया गया?

फ्रांस 24 के मुताबिक, राफेल डील में हुआ एक अहम बदलाव सबको हैरान करने वाला था। भारत में एचएएल के पास रक्षा क्षेत्र में मैन्यूफैक्चरिंग का 78 साल का तजुर्बा है और वह इस ऑफसेट क्लॉज में एक मात्र कंपनी है जिसके पक्ष में फैसला किया जाता।

लेकिन दसॉल्ट ने एचएएल से करार तोड़ते हुए अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप से करार कर लिया। खासबात यह है कि इस वक्त तक रिलायंस के पास रक्षा क्षेत्र की मैन्यूफैक्चरिंग तो दूर उसे एविएशन सेक्टर का भी कोई तजुर्बा नहीं था।

राफेल डील की शुरुआत 2007 में हुई थी। डील के वक्त भारत का मानना था कि इस डील से भारत सरकार की एरोस्पेस और डिफेंस कंपनी एचएएल की आधुनिक उत्पादन क्षमता में इज़ाफा होगा और वह देश के लिए लड़ाकू विमान बनाने के लिए तैयार हो जाएगी।

फ्रांस 24 ने दावा किया कि राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट ने जिस भारतीय कंपनी को एचएएल के मुकाबले तरजीह दी उस कंपनी को इस डील से महज़ 15 दिन पहले ही स्थापित किया गया। खासबात यह है कि कंपनी को स्थापित करने की यह तारीख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फ्रांस दौरे से महज 13 दिन पहले की है।

अखबार ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा में शामिल कारोबारियों में अनिल अंबानी भी मौजूद थे। इसके साथ ही अखबार ने राफ़ेल डील की तुलना बोफोर्स डील से की है।
फ्रांस 24 ने लिखा कि मौजूदा परिस्थिति में साफ है कि राफेल डील भारत के आगामी आम चुनावों में ठीक वही भूमिका अदा कर सकता है जो 1980 के दशक में बोफोर्स डील ने किया था।

बता दें कि बोफोर्स डील पर विवाद के चलते राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था वहीं इस बार निशाने पर मोदी सरकार है।

 

Source: boltaup.com

अडानी और अंबानी पर 50,000 करोड़ के कोयला घोटाले का आरोप, DRI ने दिए सबूत, बॉम्बे HC पहुंचे अडानी

Adani and Ambani accused of 50000 crore coal scam

मोदी सरकार के करीबी माने जाने वाले गौतम अडानी और अनिल अंबानी पर 50,000 करोड़ से ज़्यादा के कोयल घोटाला का आरोप राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने लगाया है। अडानी समूह मंगलवार को बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा है।

समूह ने एक याचिका दायर करते हुए समूह की कुछ फर्मों के खिलाफ जारी किए गए लेटर्स रोगेटरी (एलआर) को रद्द करने की अपील की है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक ये एलआर डीआरआई ने इन फर्मों द्वारा इंडोनेशिया से आयात किए गए कोयले की कीमत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जाने (ओवर इनवॉयसिंग) के मामले में जारी किए हैं।

एलआर एक औपचारिक अनुरोध पत्र होता है जो किसी आरोपित कंपनी की जांच के लिए दूसरे देश से न्यायिक सहायता मांगने के लिए दिया जाता है।

अडानी समूह ने यह कदम उसकी कंपनी अडानी ग्लोबल के खिलाफ सिंगापुर हाई कोर्ट के फैसले के बाद उठाया है। वहां की एक निचली अदालत ने अडानी समूह की कुछ कंपनियों के अलावा कुछ शिपिंग कंपनियों और बैंकों से कहा था कि वे इस मामले में जरूरी दस्तावेज उसके पास जमा कराएं।

अदालत ने यह कदम डीआरआई से एलआर मिलने के बाद उठाया था। इसके खिलाफ अडानी ग्लोबल सिंगापुर हाई कोर्ट में गई थी। लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली थी।

क्या है घोटाला
मार्च, 2016 में डीआरआई ने दावा किया था कि बिजली उत्पादन क्षेत्र में सक्रिय कई कंपनियों द्वारा इंडोनेशिया से आयात किये जा रहे कोयले की ओवर इनवॉयसिंग की गई। जानकारों के मुताबिक इस तरह से न सिर्फ कालेधन को सफेद बनाया जाता है बल्कि सरकारों पर बिजली के दाम बढ़ाने का दबाव भी बनाया जाता है।

‘द कैरावान’ पत्रिका की खबर के मुताबिक, डीआरआई ने पिछले चार साल में अपनी जांच में पाया है कि कोयला खनन और बिजली उत्पादन का कार्य करने वाली निजी कम्पनियाँ ने हज़ारों करोड़ के घोटाले को अंजाम दिया है।

इन कंपनियों में उद्योगपति गौतम अडानी और अनिल अम्बानी की कंपनियां का भी शामिल हैं। इन दोनों ही उद्योगपतियों को मोदी सरकार का करीबी माना जाता है। बता दें, कि डीआरआई वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आती है।

डीआरआई का आरोप है कि इन कंपनियों ने बिजली के लिए विदेश से जो कोयला मंगाया उसकी ओवर-इनवॉइसिंग की यानि उसकी कीमत असल कीमत से बढ़ाकर दिखाई और इस तरह इसका प्रभाव बिजली के दामों पर पड़ा।

अंत में हमेशा की तरह इस घोटाले से भी जनता की कमर टूटी और जनता ने बिजली के महंगे दाम चुकाए। इस तरह इन्होने जनता से बिजली के महंगे दाम वसूल कर घोटाले को अंजाम दिया।

डीआरआई के मुताबिक, ये घोटाला लगभग 50,000 करोड़ का है। इसमें से 30,000 करोड़ रुपये का कोयला इंडोनेशिया से मंगाया गया और 20,000 करोड़ रुपये का चीन से। इसमें सरकारी कम्पनियाँ जैसे ‘नेशनल थर्मल पॉवर कारपोरेशन’ भी शामिल हैं जो इन निजी कंपनियों के साथ मिलकर कार्य करती हैं।

 

Source: boltaup.com

राफेल डील-पीएम मोदी और अनिल अंबानी के बीच सीधा सौदा हुआ: कांग्रेस

Rafael Deal A direct deal between PM Modi and Anil Ambani Congress

कांग्रेस ने राफेल मामले को लेकर मंगलवार को आरोप लगाया कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति अनिल अंबानी के बीच का ‘सीधा सौदा’ है. पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता एस जयपाल रेड्डी ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मध्ययुगीन राजा’ की तरह व्यवहार किया.

रेड्डी ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी के बीच का सीधा सौदा है. मैं यह क्यों कह रहा हूं? इसके कुछ ठोस आधार हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘अप्रैल, 2015 में हुए सौदे से दो दिन पहले विदेश सचिव ने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति के बीच मुलाकात में राफेल पर चर्चा नहीं की जाएगी. सौदे से दो दिन पहले हमारे विदेश सचिव को यह पता नहीं था कि इस सौदे पर पर चर्चा की जाएगी और यह फैसला हो चुका है.’’

रेड्डी ने कहा, ‘‘तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर फ्रांस में नहीं थे. इससे भी अहम बात यह कि सौदा होने के बाद पर्रिकर ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति ने हस्तक्षार किए हैं और मैंने इसका समर्थन किया है. आमतौर पर फैसला मंत्री करता है और प्रधानमंत्री इसका समर्थन करते हैं.’’

अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की ओर से कानूनी नोटिस दिए जाने पर रेड्डी ने कहा, ‘‘हमारे नेता कानूनी नोटिसों से नहीं डरते हैं. एक तरह से यह अच्छा है कि अनिल अंबानी ने नोटिस दिया. फिलहाल, सरकार राफेल सौदे का ब्यौरा देने से इनकार कर रही है.’’

बता दें कि फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के सौदे में नाम लिए जाने को लेकर उद्योगपति अनिल अंबानी ने पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पत्र लिखा था. पत्र में उन्होंने इन आरोपों को खारिज किया था कि उनके रिलायंस समूह के पास राफेल लड़ाकू जेट बनाने के लिए अनुभव की कमी है. अंबानी ने यह भी कहा था कि फ्रांसीसी समूह डसॉल्ट द्वारा उनकी कंपनी को स्थानीय भागीदार के रूप में चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

हालांकि, इसके बाद भी कांग्रेस राफेल डील को लेकर सरकार और अनिल अंबानी पर लगातार हमले कर रही है. दो दिन पहले ही पूर्व वित्‍त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि राफेल सौदे में रक्षा खरीदी की प्रक्रिया का पालन नहीं किया. पार्टी अध्‍यक्ष राहुल गांधी भी कई बार कह चुके हैं कि राफेल सौदे में एनडीए सरकार ने राष्‍ट्रीय हितों की अनदेखी की और एक बिजनेसमैन को फायदा पहुंचाया.

 

Source: hindi.siasat.com

BJP के दो पूर्व मंत्रियों ने माना- राफेल विमान सौदा आजाद भारत का सबसे बड़ा ‘रक्षा घोटाला’ है

Yashwant and Arun Shourie press conference on Rafale Deal

राफेल विमान को लेकर अब मोदी सरकार पर सबसे बड़ा वार कर दिया गया है। पहले इस घोटाले को लेकर आरोप केवल सड़क पर थे जिसे विपक्ष ने संसद में पहुँचाया। और अब भाजपा के अपने ही नेताओं ने इन आरोपों को अख़बारों की सुर्खियाँ बनने पर मजबूर कर दिया है।

राफेल विमान सौदा आजाद भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा घोटाला और इससे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया है। ये आरोप भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी और सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने लगाए।

इन आरोपों को उन्होंने किसी अखबार में लेख लिखकर नहीं बल्कि खुलेआम सबूत और दलीलें पेश करते हुए पूरी मीडिया के सामने लगाया है। इसके लिए इन तीनों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस की थी।

दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में अरुण शौरी ने कहा कि राफेल विमान डील आजाद भारत का सबसे बड़ा डिफेंस घोटाला है और इसमें एक नहीं कई गड़बड़ियां की गई हैं। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री ने लोकसभा में कहा था कि अनिल अंबानी की कंपनी को राफेल विमान बनाने का ऑर्डर क्यों और कैसे मिला, इसकी जानकारी नहीं दे सकतीं, क्योंकि वे फ्रांस सरकार के साथ हुए गोपनीयता के समझौते से बंधी हुई हैं।

अरुण शौरी ने कहा कि रक्षा मंत्री ने लोकसभा में सबसे बड़ा झूठ बोला। उन्होंने बताया कि भारत और फ्रांस के बीच हुए गोपनीयता समझौते में साफ लिखा है कि सिर्फ विमान की तकनीक से जुड़ी जानकारियों के लिए ही यह समझौता प्रभावी होगा। उन्होंने सवाल पूछा कि रक्षा मंत्री बताएं कि अनिल अंबानी की कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट क्यों दिया गया, क्योंकि यह समझौता इसका जवाब देने से नहीं रोकता है।

कीमत का खुलासा न करने का तर्क भी बेकार है। सरकार के रक्षा राज्यमंत्री 18 नवम्बर 2016 को खुद लोकसभा में कीमत बता चुके हैं- 670 करोड़ प्रति विमान, जिसमें हथियार से लेकर टेक्नालॉजी ट्रांसफर तक सब कुछ शामिल है।

शौरी ने कहा कि सरकार की गाइडलाइन कहती है कि हर ऑफ़सेट कॉन्ट्रेक्ट चाहे वह जिस भी क़ीमत का हो, रक्षा मंत्री की मंज़ूरी से होगा। सरकार झूठ बोल रही है कि रिलायंस को कॉन्ट्रेक्ट डेसाल्ट ने दिया।

प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मोदी सरकार ने राफेल डील में देश की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ किया है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि इस सौदे से देश को 35000 करोड़ दी चपत लगी है। सौदे में विमान की तादाद घटाए जाने से देश की सुरक्षा को ख़तरा बढ़ा है। प्रशांत भूषण ने कहा कि देश को सुरक्षा के लिए सात स्क्वाड्रन की ज़रूरत है, तभी 126 विमानों की बात हुई थी। लेकिन मोदी सरकार ने इस हकीकत को जानते हुए भी यह संख्या 36 कर दी, वह भी बिना किसी की जानकारी के। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ है।

तादाद 126 से 36 किए जाने की जानकारी न तो रक्षा मंत्री को थी न वायुसेना में किसी को। सरकार गोपनीयता नियम का बहाना करके छिपाना चाह रही है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की मंजूरी के बिना प्रधानमंत्री को कोई अधिकार नहीं था कि वे यह समझौता करते, इस नाते यह आपराधिक आचरण का मामला बनता है। यह जानते हुए ही सरकार ने उस कानून को संशोधित कर दिया।

प्रशांत भूषण ने कहा कि इस सौदे में पहले सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को राफेल विमान बनाने की तकनीक मिलनी थी, लेकिन फ्रांस के साथ राफेल विमान सौदे से महज पांच महीने पहले अचानक अस्तित्व में आई अनिल अंबानी की कंपनी को फ्रांस के साथ राफेल विमान बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया।

उन्होंने कहा कि अनिल अंबानी की कंपनी को साधारण विमान बनाने का भी कोई अनुभव नहीं है। प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि कंपनी बनाई ही इसलिए गई ताकि ये कॉन्ट्रैक्ट हासिल हो सके। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी बात ये है कि जिस उद्योगपति को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई, उसका पिछला इतिहास यही कहता है कि उसके ज्यादातर बड़े प्रोजेक्ट्स नाकाम साबित हुए और उसकी कंपनी बड़े कर्ज में डूबी हुई है।

प्रेस कांफ्रेंस में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि विदेश सचिव ने समझौते से दो दिन पहले कहा था कि पुरानी डील को ही आगे बढ़ाएंगे, पर वहां जाकर नई डील कर ली गई। उन्होंने कहा कि इस लोकसभा में संयुक्त संसदीय समिति को मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि समय कम है। इसलिए इस मामले की सीएजी से जांच कराई जानी चाहिए और तीन महीने के अंदर समयबद्ध जांच हो।

उन्होंने आरोप लगाया कि नोटबंदी के बाद जो दो हजार के नोट छपवाये गये थे, अब वे बाजार में जल्दी नहीं दिखते। दो हजार के अधिकांश नोटों को कालेधन के रुप में जमा कर रखा गया है और जरुरत पड़ने पर उन्हे खर्च किया जाएगा।

Source: boltaup.com

कांग्रेस ने पेश किए दस्तावेज़, अनिल अंबानी को राफेल सौदे से 1,30,000 करोड़ का हुआ फायदा, कंपनी को मिला लाइफटाइम कॉन्ट्रेक्ट

Anil Ambani gets profit of 130000 crore from Rafale deal

राफेल विमान सौदे को लेकर रोज़ नए खुलासे सामने आ रहे हैं। अभी तक ये आरोप था कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी को हज़ारों करोड़ रुपये का फायदा पहुँचाने के लिए विमानों को महंगे दाम पर खरीदा है।

अब सामने आया है कि इस सौदे से अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ का नहीं बल्कि एक लाख 30,000 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। ये आरोप कांग्रेस ने दस्तावेज़ पेश करते हुए लगाया है।

कांग्रेस ने शुक्रवार को दावा किया कि इस लड़ाकू विमान सौदे के संदर्भ में एक नामी भारतीय समूह की रक्षा कंपनी को कुल 1,30,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह दावा करते हुए रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण पर निशाना साधा और उनपर देश से झूठ बोलने का आरोप लगाया।

सुरजेवाला ने कुछ दस्तावेज सामने रखते हुए संवाददाताओं से कहा, ‘राफेल सौदे की आए दिन खुलती परतें प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री द्वारा बोले गए झूठ की परतें खोल रही हैं। कल्चर ऑफ क्रोनी कैपिटलिज्म (छद्म पूंजीवाद की संस्कृति) मोदी सरकार का डीएनए बन गई है। इस सौदे से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाए जाने की बू आती है।”

उन्होंने दावा किया कि फ्रांस के साथ 36 राफेल विमान की खरीद का समझौता होने के बाद इस विमान सौदे से जुड़ा कॉन्ट्रैक्ट सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से लेकर एक निजी भारतीय समूह की रक्षा कंपनी को दिया गया जबकि यह कंपनी समझौते से 12 दिन पहले पंजीकृत हुई थी और उसके पास विमान बनाने का कोई अनुभव नहीं है।

सुरजेवाला के मुताबिक इस निजी भारतीय कंपनी ने पिछले साल 16 फरवरी को बयान जारी कर कहा कि उसे राफेल से जुड़ा 30,000 करोड़ रुपये का ‘ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट’ और 1,00,000 एक लाख करोड़ रुपये का ‘लाइफ साइकल कॉन्ट्रैक्ट’ मिला है। उन्होंने यह भी दावा किया कि एक सरकारी विज्ञप्ति में रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें निजी कंपनी को ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने की जानकारी नहीं है।

क्या है राफेल घोटाला?

राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अम्बानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए 2016 में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अम्बानी की कंपनी बनाएगी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

 

Source: boltaup.com