पुण्यप्रसून वाजपेयी का लेखः अरबों रुपये लुटाकर जो संसद पहुंचा, वह तो देश लूटेगा ही और सत्ता-संसद ही उसे बचाएगी

Punya Prasun Bajpai article on election and leader

एक मार्च 2016 को विजय माल्या संसद के सेन्ट्रल हाल में वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिलते हैं. दो मार्च को रात ग्यारह बजे दर्जन भर बक्सों के साथ जेय एयरवेज की फ्लाइट से लंदन रवाना हो जाते हैं. फ्लाइट के अधिकारी माल्या को विशेष यात्री के तौर पर सारी सुविधाये देते हैं. और उसके बाद देश में शुरु होता है माल्या के खिलाफ कार्रवाई करने का सिलसिला या कहें कार्रवाई दिखाने का सिलसिला. क्योंकि देश छोड़ने के बाद देश के 17 बैंक सुप्रीम कोर्ट में विजय माल्या के खिलाफ याचिका डालते हैं. जिसमें बैक से कर्ज लेकर अरबो रुपये ना लौटाने का जिक्र होता है और सभी बैंक गुहार लगाते है कि माल्या देश छोड़कर ना भाग जाये इस दिशा में जरुरी कार्रवाई करें. माल्या के देश छोडने के बाद ईडी भी माल्या के देश छोडने के बाद अपने एयरलाइन्स के लिये लिये गये 900 करोड रुपये देश से बाहर भेजने का केस दर्ज करता है. माल्या के देश छोडने के बाद 13 मार्च को हैदराबाद हाईकोर्ट भी माल्या के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करता है.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
Punya Prasun Bajpai article on election and leader

क्योंकि माल्या जीएमआर हेदराबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम जो पचास लाख का चेक देते हैं, वह बाउंस कर जाता है. 24 अप्रैाल को राज्यसभा की ऐथिक्स कमेटी की रिपोर्ट में माल्या को राज्यसभा की सदस्यतता रद्द करने की बात इस टिप्पणी के साथ कहती है कि 3 मई को वह माल्या को सदन से निलंबित किया जाये या नही इस पर फैसला सुनायेगी. और फैसले के 24 घंटे पहले यानी 2 मई को राज्यसभा के चैयरमैन हामिद अंसारी के पास विजय माल्या का फैक्स आता है जिसमें वह अपने उपर लगाये गये आरोपो को गलत ठहराते हुये राज्यसभा की सदस्यतता से इस्तीफा दे देते हैं. और अगले दिन यानी तीन मई 2016 को राज्यसभा के एथिक्स कमेटी माल्या की सदस्यता रद्द करने का फैसला दे देती है. उसके बाद जांच एजेंसियां जागती हैं. पासपोर्ट अवैध करार दिये जाते हैं . विदेश यात्रा पर रोक लग जाती है. तमाम संपत्ति जब्त करने की एलान हो जाता है. और किसी आर्थिक अपराधी यानी देश को चूना लगाने वाले शख्स के खिलाफ कौन-कौन सी एजेंसी क्या क्या कर सकती है, वह सब होता है. चाहे सीबीआई हो आईबी हो ईडी हो या फिर खुद संसद ही क्यो ना हो.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
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तो क्या वाकई देश ऐसे चलता है जैसा आज कांग्रेसी नेता पूनिया कह गये कि अगर संसद के सीसीटीवी को खंगाला जाये तो देश खुद ही देख लेगा कि कैसे माल्या और जेटली एक मार्च 2016 को संसद के सेन्ट्रल हाल में बात नहीं बल्कि अकेले गुफ्तगु भर नहीं बल्कि बैठक कर रहे थे. और यह झूठ हुआ तो वह राजनीति छोड देंगे. या फिर वित्त मंत्री अरुण जेटली बोले, माल्या मिले थे. पर बतौर राज्यसभा सांसद वह तब किसी से भी मिल सकते थे. पर कोई बैठक नहीं हुई. तो सवाल तीन हैं. पहला, जो संसद कानून बनाती है उसे ही नहीं पता कानून तोडने वाले अगर उसके साथ बैठे हैं तो उसे क्या करना चाहिये.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
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दूसरा, सांसद बन कर अपराध होता है या अपराधी होते हुये सांसद बन कर विशेषाधिकार पाकर सुविधा मिल जाती है. तीसरा , देश में कानून का राज के दायरे में सांसद या संसद नहीं आती है क्योंकि कानून वही बनते हैं. दरअसल तीनों सवालो के जवाब उस हकीकत में छिपे हैं कि आखिर कैसे विजयमाल्या सांसद बनते है और कैसे देश की संसदीय राजनीति करोडो के वारे न्यारे तले बिक जाती है. उसके लिये विचार , कानून या ईमानदारी कोई मायने नहीं रखती है. कैसे ? इसके लिये आपको 2002 और 2010 में राज्यसभा के लिये चुने गये विजय माल्या के पैसो के आगे रेंगते कांग्रेस और बीजेपी के सांसदों के जरीये समझना होगा. या फिर कार्नाटक में मौजूदा सत्ताधारी जेडीएस का खेल ही कि कैसे करोडों-अरबों के खेल तले होता रहा इसे भी समझना होगा और संसद पहुंचकर कोई बिजनेसमैन कैसे अपना धंधा चमका लेता है इसे भी जानना होगा. 2002 में कर्नाटक में कांग्रेस की सत्ता थी. तो राज्यसभा के चार सदस्यों के लिये चुनाव होता है. चुने जाने के लिये हर उम्मीदवार को औसत वोट 43.8 चाहिये थे. कांग्रेस के तीन उम्मीदवार जीतते हैं और 40 विधायकों को संभाले बीजेपी के एक मात्र डीके तारादेवी सिद्दार्थ हार जाते हैं. क्योंकि बीजेपी को हराने के लिये कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर निर्दलीय उम्मीदवार विजयमाल्या को जीता देती है.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
Punya Prasun Bajpai article on election and leader

और मजे की बाज तो ये भी होती है कि बीजेपी के चार विधायक भी तब बिक जाते हैं. यानी रिजल्ट आने पर पता चलता है कि विजयमाल्या को 46 वोट मिल गये. यानी दो वोट ज्यादा. और तब अखबारों में सुर्खियां यही बनती है कि करोडों का खेल कर विजय माल्या संसद पहुंच गये. तब हर विधायक के हिस्से में कितना आया इसकी कोई तय रकम तो सामने नहीं आती है लेकिन 25 करोड रुपये हर विधायक के आसरे कर्नाटक के अखबार विश्लेषण जरुर करते हैं. आप सोच सकते हैं कि 2002 में 46 वोट पाने के लिये 25 करोड़ के हिसाब से 11 अरब 50 करोड रुपये जो बांटे गये होंगे, वह कहां से आये होंगे और फिर उसकी वसूली संसद पहुंच कर कैसे विजय माल्या ने की होगी. क्योंकि वाजपेयी सरकार के बाद जब मनमोहन सिंह की सरकार बनती है और उड्डयन मंत्रालय एनसीपी के पास जाता है.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
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प्रफुल्ल पटेल उड्डयन मंत्री बनते हैं और तब विजय माल्या उड्डयन मंत्रालय की समिति के स्थायी सदस्य बन जाते हैं. और अपने ही धंधे के ऊपर संसदीय समिति का हर निर्णय कैसे मुहर लगाता होगा, ये बताने की जरुर नहीं है. और उस दौर में किगंफिशर की उड़ान कैसे आसामान से उपर होती है, ये कोई कहां भूला होगा. पर बात यही नहीं रुकती . 2010 में फिर से कर्नाटक से 4 राज्यसभा सीट खाली होती हैं. इस बार सत्ता में बीजेपी के सरकार कर्नाटक में होती है. और औसत 45 विधायकों के वोट की जरुरत चुने जाने के लिये होती है. बीजेपी के दो और कांग्रेस का एक उम्मीदवार तो पहले चरण के वोट में ही जीत जाता है. पर चौथे उम्मीदवार के तौर पर इस बार कांग्रेस का उम्मीदवार फंस जाता है. क्योंकि कांग्रेस के पास 29 वोट होते हैं. बीजेपी के पास 26 वोट होते है . और 27 वोट जेडीएस के होते हैं.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
Punya Prasun Bajpai article on election and leader

जेडीएस सीधे करोडों का सौदा एकमुश्त करती है. तो 5 निर्दलीय विधायक भी माल्या के लिये बिक जाते हैं. और 13 वोट बीजेपी की तरफ से पड़ जाते हैं. यानी 2002 की सुई काग्रेस से घुम कर 2010 में बीजेपी के पक्ष में माल्या के लिये घुम जाती है. फिर कर्नाटक के अखबारों में खबर छपती है करोडों-अरबों का खेल हुआ है. इसबार रकम 25 करोड से ज्यादा बतायी जाती है. यानी 2002 की साढे ग्यारह अरब की रकम 20 अरब तक बतायी जाती है. तो फिर ये रकम कहां से विजय माल्या लाये होंगे और जहां से लाये होंगे, वहां वापस रकम कैसे भरेंगे. ये खेल संसद में रहते हुये कोई खुले तौर पर खेलता है. इस दौर में आफशोर इन्वेस्टमेंट को लेकर जब पनामा पेपर और पैराडाइड पेपर आते है तो उसमें भी विजय माल्या का नाम होता है. यानी एक लंबी फेरहिस्त है माल्या को लेकर. लेकिन देश जब नये सवाल में जा उलझा है कि संसद में 1 मार्च 2016 को विजयमाल्या लंदन भागने से पहले वित्त मंत्री से मिले या नहीं? या क्या वह वाकई कह रहे थे कि वह भाग रहे हैं, पीछे सब देख लेना. और पीछे देखने का सिललिसा कैसे होता है, ये पूरा देश देख समझ सकता है.

Punya Prasun Bajpai article on election and leader
Punya Prasun Bajpai article on election and leader

लेकिन आखिरी सवाल तो यही है कि जिस संसद में 218 सांसद दागदार हैं, उसी संसद के एक पूर्व सदस्य से अरबों रुपये लेकर कर्नाटक की सियासत और देश की संसद अगर 2002 से लेकर 2016 तक चलती रही तो यह क्यो ना मान लिया जाये कि संसद ऐसे ही चलती है और अरबों रुपये लुटाकर जो संसद पहुंचेगा वह देश को नहीं तो किसे लुटेगा.

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देने के बाद यदि अमित शाह सोचते हैं कि भाजपा 50 सालो तक राज करेगी तो इसका बड़ा कारण……

Girish Malviya article on Modi and Shah

गिरीश मालवीय

बीते रोज़ सोमवार को दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर रुपया डॉलर के मुकाबले 72.67 पर पहुंच गया दरअसल इस साल डॉलर के मुकाबले रुपया 11 प्रतिशत से ज्यादा टूट चुका है रुपये को इस गिरती हालत से बचाने के लिए आरबीआई अभी तक करीब 22 बिलियन डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल कर चुका है लेकिन हालात अभी नहीं सुधरे हैं।

इस गिरते हुए रुपये से भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान झेलना पड़ रहा है स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों से यह तथ्य सामने आया है कि रुपये के अवमूल्यन के कारण भारत को विदेशी कर्ज चुकाने में 68,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे यह लघु अवधि में चुकाए जाने वाले कर्ज हैं जिन्हें अगले कुछ महीनों में वापस किया जाना है।

इस दरमियान कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें ऐसी ही है जैसा कहा जाता है कि ‘एक तो दुबले ऊपर से दो आषाढ़’ , एसबीआई के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष का मानना है कि अगर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत औसतन 76 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो देश का तेल आयात बिल 45,700 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा।

बैंकों की हालत बढ़ते एनपीए के कारण पहले ही खराब है नोटबन्दी और जल्दबाज़ी में लागू की गयीं जीएसटी ने छोटे और मध्यम श्रेणी के उद्योगों पर गहरी मार मारी है असंगठित क्षेत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया है भारतीय अर्थव्यवस्था को इस कदर बर्बाद कर देने के बाद भाजपा यदि अब भी सोचती हैं कि 2019 में जीतने के बाद वह 50 सालो तक राज करेगी। तो इसका बड़ा कारण कमजोर विपक्ष भी है।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार एंव स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

पुण्यप्रसून वाजपेयी का लेखः मान लीजिए…..मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल है..

Punya Prasun Bajpai article on Modi and economy

हो सकता है डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत का असर सरकार पर ना पड़ रहा हो और सरकार ये सोच रही हो कि उसका वोटर तो देशभक्त है और रुपया देशभक्ति का प्रतीक है क्योंकि डॉलर तो विदेशी करेंसी है। पर जब किसी देश की अर्थव्यवस्था संभाले ना संभले तो सवाल सिर्फ करेंसी का नहीं होता। और ये कहकर कोई सरकार बच भी नहीं सकती है कि उसके खजाने में डॉलर भरा पड़ा है । विदेशी निवेश पहली की सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है । तो फिर चिन्ता किस बात की। दरअसल किस तरह देश जिस रास्ते निकल पड़ा है, उसमें सवाल सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने भर का नहीं है । देश में उच्च शिक्षा का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि 40 फीसदी की बढ़ोतरी बीते तीन बरस में छात्रों के विदेश जाने की हो गई है। सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि कोयला खादानो को लेकर सरकार के रुख ने ये हालात पैदा कर दिए हैं कि कोयले का आयात 66 फीसदी तक बढ़ गया है । भारत में इलाज सस्ता जरुर है लेकिन जो विदेश में इलाज कराने जाने वालो की तादाद में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है । चीनी , चावल, गेहूं , प्याज के आयात में भी 6 से 11 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो गई है। और दुनिया के बाजार से कोई भी उत्पाद लाने या दुनिया के बाजार में जाकर पढ़ाई करने या इलाज कराने का मतलब है डॉलर से भुगतान करना।

तो सच कहां से शुरु करें। पहला सच तो शिक्षा से ही जुड़ा है । 2013-14 में भारत से विदेश जाकर पढने वाले छात्रों को 61.71 रुपये के हिसाब से डॉलर का भुगतान करना पड़ता था । तो विदेश में पढ रहे भारतीय बच्चों को ट्यूशन फीस और हास्टल का कुल खर्चा 1.9 बिलियन डॉलर यानी 117 अरब 24 करोड 90 लाख रुपये देने पड़ते थे। और 2017-18 में ये रकम बढकर 2.8 बिलियन डॉलर यानी 201 अरब 88 करोड़ रुपये हो गई । और ये रकम इसलिये बढ़ गई क्योंकि रुपया कमजोर हो गया। डॉलर का मूल्य बढ़ता गया । यानी डॉलर जो 72 रुपये को छू रहा है अगर वह 2013-14 के मूल्य के बराबर टिका रहता तो करीब तीस अरब रुपये से ज्यादा भारतीय छात्रों का बच जाता । पर यहा सवाल सिर्फ डॉलर भर नहीं है ।

सवाल तो ये है कि आखिर वह कौन से हालात हैं, जब भारतीय यूनिवर्सिटिज को लेकर छात्रों का भरोसा डगमगा गया है । तो सरकार कह सकती है कि जो पढने बाहर जाते है उन्हें वह रोक नहीं सकते लेकिन शिक्षा के हालात तो बेहतर हुये हैं। तो इसका दूसरा चेहरा विदेश से भारत आकर पढ़ने वाले छात्रों की तादाद में कमी क्यो आ गई इससे समझा जा सकता है । रिजर्व बैंक की ही रिपोर्ट कहती है कि 2013-14 में जब मनमोहन सरकार थी तब विदेश से जितने छात्र पढने भारत आते थे उससे भारत को 600 मिलियन डालर की कमाई होती थी । पर 2017-18 में ये कम होते होते 479 मिलियन डालर पर आ गई । यानी कही ना कही शिक्षा अनुरुप हालात नहीं है तो फिर डॉलर या रुपये से इतर ज्यादा बडा सवाल तो ये हो चला है कि उच्च सिक्षा के लिये अगर भारतीय बच्चे विदेश जा रहे हैं और पढाई के बाद भारत लौटना नहीं चाहते हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी या फिर वोट बैक पर असर नही पडता है, यह सोचकर हर कोई खामोश है।

क्योंकि आलम तो ये भी है कि अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया जाकर पढने वाले बच्चों की तादाद लाखों में बढ़ गई है । सिर्फ अमेरिका जाने वाले बच्चो की तादाद मनमोहन सरकार के आखिरी दिनों में 1,25,897 थी जो 2016-17 में बढकर 1,86,267 हो गई । इसी तरह आस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले बच्चो की संख्या में 35 फिसदी से ज्यादा का इजाफा हो गया । 2014 में 42 हजार भारतीय बच्चे आस्ट्रलिया में थे तो 2017 में ये बढकर 68 हजार हो गये । लोकसभा में सरकार ने ही जो आंकडे रखे वह बताता है कि बीते तीन बरस में सवा लाख छात्रो को वीजा दिया गया ।

तो क्या सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये की कम होती कीमत भर का मामला है । क्योंकि देश छोडकर जाने वालो की तादाद और दुनिया के बाजार से भारत आयात किये जाने वाले उत्पादों में लगातार वृद्दि हो रही है। और इसे हर कोई जानता समझता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा तो आयल इंपोर्ट बिल बढ जायेगा । चालू खाते का घाटा बढ़ जायेगा। व्यापार घाटा और ज्यादा बढ जायेगा । जो कंपनियां आयात ज्यादा करती है उनका मार्जिन घट रहा है । विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ने लगा है क्योंकि दुनिया के बाजार में छात्रों की ट्यूशन फीस की तरह ही सरकार को भी भुगतान डालर में ही करना पडता है । और इन सब का सीधा असर कैसे महंगाई पर पड़ रहा है और सवाल मीडिल क्लास भर का नहीं है बल्कि देश में किसानों को सिंचाई तक की व्यवस्था ना पाने वाली अर्थवयवस्था या कहे इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के दावों के बीच का सच यही है कि 42 फीसदी किसान डीजल का उपयोग कर ट्यूबवेल से पानी निकालते है । और महंगा होता डीजल उनकी सुबह शाम की रोटी पर असर डाल रहा है । तो महंगे हालात या कहें डॉलर के मुकाबले रुपये की चिंता तब नहीं होती जब भारत स्वालंबी होता । सरकार ही जब विदेशी चुनावी फंड या विदेशी डालर के कमीशन पर जा टिकेगी तो फिर डालर की महत्ता होगी क्या ये बताने की जरुरत होनी नहीं चाहिये। और ये सवाल होगा ही कि सरकार इक्नामी संभालने में सक्षम नहीं है, क्योंकि चीन अमेरिका व्यापार युद्द में भी भारत फंसा । अमेरिकी फेडरेल बैक ने ब्याज दर बढाई तो अमेरिकी कारोबारी उत्साहित हुय़े । भारत में डालर लगाकर बैठे अमेरिकी कारोबारी ही नहीं दुनिया भर के कारोबारियों ने या कहें निवेशकों ने भारत से पैसा निकाला। वह अमेरिका जाने लगे हैं।

इससे अंतर्रष्ट्रीय बाजार में डालर की मांग लगातार बढ़ गई । यूरोपिय देशों के औसत प्रदर्शन से भी अमेरिका में निवेश और डॉलर को लगातार मजबूती मिल रही है । और इन हालातो के बीच कच्चे तेल की बढती किमतो ने भारत के खजाने पर कील ठोंकने का काम कर दिया है । यानी ये सोचा ही नहीं गया कि इक्नामी संभालने का मतलब ये भी होता है कि भारत खुद हर उत्पाद का इतना उत्पादन करें कि वह निर्यात करने लगे । तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी के जरीये दुनिया को पाठ पढाने वाले भारत को आज विदेशी शिक्षकों तक की जरुरत पड़ गई । यानी कैसे सत्ता ने खुद को ही देश से काटकर देश से जुडे होने का दावा किया ये भी कम दिलचस्प नहीं है । लकीर महीन पर पर समझना जरुरी है कि गांव का देश भारत कैसे स्मार्ट सीटी बनाने की दिशा में बढ गया । और स्मार्ट सिटी बनाने के लिये जिस इन्फ्रस्ट्क्चर को खड़ा करने की जरुरत बनायी गई उसमें भी विदेशी कंपनियो की ही भरमार है । चीन ने अपने गांव को देखा ।

जनसंख्या के जरीये श्रम को परखा । अपनी करेंसी की कीमत को कम कर दुनिया के बाजारा को अपने उत्पाद से भर दिया । भारत ने गांव की तरफ देखा ही नहीं । खेत से फैक्ट्री कैसे जुडे । खनिज संसाधनो का उपयोग उत्पादन बढाने में कैसे लगाये । उत्पादन के साथ रोजगार को कैसे जोडें । इन हालातो को दरकिनार कर उल्टे रास्ते इकनामी को चला दिया । जिससे सरकार का खजाना बढे या कहे राजनीतिक सत्ता तले ही सारे निर्णय हो । उसकी एवज में उसी पूंजी मिले । उसी पूंजी से वह चुनाव लडे । और चुनाव लडने के लिये रास्ता इतना महंगा कर दें कि कोई सामान्य सोच ना सके कि लोकतंत्र का स्वाद वह भी चख सकता है । तो हुआ यही कि भारतीय मजदूर सबसे सस्ते हैं । जमीन मुफ्त में मिल जाती है । खनिज संपदा के मोल कौड़ियों के भाव हैं। और इसकी एवज में सत्ता सरकार को कुछ डालर थमाने होंगे। क्योंकि ध्यान दीजिये देश की संपदा की लूट बेल्लारी से लेकर झारखंड तक कैसे होती है । और तो और भारतीय कंपनिया ही लूट में हिस्सेदारी कर कैसे बहुराष्ट्रीय बन जाती है ।

सबकुछ आंखों के सामने है पर ये कोई बोलने की हिम्मत कर नहीं पाता कि राजनीतिक सत्ता ने देश की इक्नामी का बेडा गर्क कर देश के सामाजिक हालातो को उस पटरी पर ला खड़ा किया जहां जाति-धर्म का बोलबाला हो । क्योंकि जैसे ही नजर इस सच पर जायेगी कि रिजर्व बैंक को भी अब डॉलर खरीदने पड रहे है । और अपनी जरुरतों के लेकर भारत दुनिया के बाजार पर ही निर्भर हो चुका है । तो फिर अगला सवाल ये भी होगा कि चुनाव जीतने का प्रचार मंत्र भी जब गुगल , ट्विटर , सोशल मीडिया या कहें विदेशी मीडिया पर जा टिका है तो वहा भी भुगतान को डालर में ही करना पडता है । तो तस्वीर साफ होगी कि सवाल सिर्फ डॉलर की किमत बढने या रुपये का मूल्य कम होने भर का नहीं है बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था ने सिर्फ तेल, कोयला, स्टील , सेव मेवा, प्याज, गेहू भर को डालर पर निर्भर नहीं किया है बल्कि एक वोट का लोकतंत्र भी डालर पर निर्भर हो चला है।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

नज़रियाः राहुल गांधी ने पहचान लिया है कि उनका और देश का दुश्मन कौन है, इसलिये अब वे सीधा वार कर रहे हैं

Nitin Thakur article on Rahul Gandhi

नितिन ठाकुर

राहुल गांधी कुछ सही करें या गलत मगर एक चीज़ उन्होंने पिछले दिनों ठीक से पकड़ी है, वो है अपना दुश्मन। देसी ज़मीन हो या विदेशी धरती राहुल ने बीजेपी से ध्यान हटाकर आरएसएस पर केंद्रित कर दिया है। उन्होंने विदेश में अपने श्रोताओं के सामने कहा कि हमारी लड़ाई एक संगठन आरएसएस से है। उन्होंने वहां बीजेपी के बारे में नहीं बल्कि आरएसएस के बारे में विचार रखे थे। बार-बार संघ और उसके विचार पर हमला करके वो जो कर रहे हैं उससे संघ के नेतृत्व में एक असहजता है।

सभी को मालूम है कि संघ ने सामाजिक क्षेत्रों में काम करने के लिए अलग-अलग संगठन बनाए हुए हैं। राजनीति में उसका सोच विचार लागू करने का ज़िम्मा बीजेपी का है। बीजेपी अपनी वैचारिक और सांगठनिक ताकत संघ से ही पाती है। उसी के बहाने संघ हमेशा ये कहने की स्थिति में होता है कि वो खुद महज़ एक सांस्कृतिक संगठन है जिसका राजनीति से कोई लेनादेना नहीं। इसी व्यवस्था की बदौलत संघ उस स्थिति का आनंद हमेशा लेता है जहां उस पर दूसरे दल कीचड़ उछालने से बचते हैं। अक्सर ये कीचड़ बीजेपी पर उछलता है क्योंकि प्रत्यक्ष तौर पर तो राजनीति में वो है, ना कि संघ।

अब राहुल गांधी ने संघ का नाम बार-बार लेकर जता दिया है कि बीजेपी को आगे करके राजनीति खेलने की संघ की पुरानी रणनीति सफल नहीं रहेगी। राहुल ने गांधी हत्या से संघ का नाम जोड़कर मुकदमा तक झेलने की चुनौती स्वीकार ली है। वो ऐसे ही एक मुकदमे में बाकायदा पेश होते हैं, मगर माफी नहीं मांग रहे। ऐसा नहीं है कि राहुल को मालूम नहीं कि गांधी हत्या से संघ का सीधे कोई लेनादेना नहीं था, मगर कांग्रेस की दूरगामी रणनीति के तहत राहुल संघ का नाम बार-बार गांधी के हत्यारे के तौर पर लेते हैं। हत्या में शामिल गोड़से और उसके साथी हिंदू महासभा के करीबी थे, और उससे पहले संघ के भी लेकिन संघ के किसी नेता को इस मामले में सजा नहीं हुई थी।

इसके उलट पहले संघ पर लगा प्रतिबंध भी बाद में हटा लिया गया था। बावजूद इसके संघ और गांधी हत्या का संबंध पूरी तरह खारिज ना होने की वजह उस मामले में परोक्ष-अपरोक्ष शामिल रहे लोगों का संघ से रिश्ता है। गांधी हत्या के मुकदमे में पेश होने वाले सावरकर की हैसियत आज भी संघ में क्या है ये किसी से छिपा नहीं, जबकि खुद सावरकर संघ नहीं बल्कि हिंदू महासभा के नेता थे। गोड़से और उसके साथी तो सावरकर के विचारों से ही प्रेरित थे। संघ भी सावरकर को प्रेरणापुरुष मानता है। ऐसे में राहुल गांधी ने इस बारीकी को पकड़ तो लिया ही है, साथ ही वो बार-बार मंच से उठाने लगे हैं। आरएसएस कभी नहीं चाहता कि उसका नाम गांधी की हत्या से जोड़ा जाए मगर वो उन लोगों से भी कभी संबंध खत्म करने को लेकर गंभीर नहीं रहा जो उस हिंसक विचार के अनुगामी रहे, ऐसे में कुछ साइड इफेक्ट्स उसे उठाने ही पड़ेंगे।

राहुल गांधी नहीं चाहते कि लोगों के सामने भ्रम बना रहे। वो संघ और बीजेपी को अलग दिखने की सुविधा देने को तैयार नहीं हैं। काफी वक्त तक कांग्रेस की ऊर्जा बीजेपी से लड़ने में गई, जबकि उसे ताकत देनेवाला बिना एक हमला झेले आराम से फलता फूलता रहा। अब कांग्रेस में राहुल का दौर है। उन्होंने अपने हिसाब से दुश्मन चुन लिया है। पिछले दिनों संघ के एक कार्यक्रम में उन्हें न्यौता देने की जो खबरें उठीं उनसे भी यही प्रमाणित हुआ कि आरएसएस राहुल को गंभीरता से ले रहा है, ये बात अलग है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सार्वजनिक तौर पर राहुल को गंभीरता से ना लेने की बात कहकर मुस्कुराते रहे हैं।

2019 का चुनाव भले कांग्रेस हारे या जीते लेकिन संघ के लिए छीछालेदार वाला साबित ज़रूर होगा। मुखौटे के पीछे छिपकर सियासत करने की जिस सुविधा ने उसे फैलाकर देश की सत्ता पर काबिज़ कर दिया है अब वो ज़रा मुश्किल रहेगा। सार्वजनिक मौकों पर कोई स्टैंड ना लेने वाला संघ कभी भी औपचारिक तौर पर राहुल के हमलों का जवाब तो नहीं ही देगा पर राहुल का हर हमला जनता के बीच विमर्श का मौका ज़रूर तैयार करेगा। आज तक आरएसएस ने एक ही प्रवक्ता तय किया था जिसका नाम राम माधव था। बाद में ये व्यवस्था खत्म कर दी गई, और संघ विचारक या संघ के जानकार नाम की नई नस्ल टीवी स्क्रीन पर दिखऩे लगी। ये वो लोग हैं जो टीवी पर संघ की पैरोकारी तो करते हैं पर यदि इनके बयान पर बवाल हो जाए तो संघ के लिए उसकी ज़िम्मेदारी लेना ज़रूरी नहीं। आखिर इन अवैध प्रवक्ताओं की कोई औपचारिक घोषणा तो होती नहीं है, भले ही बचाव का खेल खेलते हुए एकाध को बीेजेपी राज्यसभा तक भेज कर उपकृत कर देती हो।

राहुल गांधी ने दुश्मन को पहचान लिया है, जो उनके पूर्ववर्ती या तो कर नहीं सके, या करना ज़रूरी नहीं समझा। उनका सामना एक ऐसे दुश्मन से है जो कहीं नहीं है, पर हर जगह है। कहीं भाजपा बनकर, कहीं एबीवीपी बनकर, कहीं वनवासी कल्याण आश्रम बनकर, कहीं भारत विकास परिषद बनकर, तो कहीं किसान संघ बनकर। राहुल को संगठन नहीं विचार पर हमला करना होगा। ये उन्होंने शुरू भी कर दिया है। हां, ये और बात है कि उनके अपने कांग्रेसी विचार के ग्राहक कितने लोग बने ये 2019 का नतीजा बताएगा, पर लड़ाई हो ही रही है, तो कम से कम सही मोर्चे और असल दुश्मन से ही होनी चाहिए।

(लेखक युवा पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है)

रवीश का लेखः बातों का जादूगर आज महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, राफेल डील पर क्यों खामोश हैं

Ravish Kumar article on Rafale and unemployment

भाषणों के मास्टर कहे जाते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। 2013 के साल में जब वे डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये के गिरने पर दहाड़ रहे थे तब लोग कहते थे कि वाह मोदी जी वाह। ये हुआ भाषण। ये भाषण नहीं देश का राशन है। हमें बोलने वाला नेता चाहिए। पेट को भोजन नहीं भाषण चाहिए। यह बात भी उन तक पहुंची ही होगी कि पब्लिक में बोलने वाले नेता का डिमांड है। बस उन्होंने भी बोलने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पेट्रोल महंगा होता था, मोदी जी बोलते थे। रुपया गिरता था, मोदी जी बोलते थे। ट्विट पर रि-ट्विट। डिबेट पर डिबेट। 2018 में हम इस मोड़ पर पहुंचे हैं जहां 2013 का साल राष्ट्रीय फ्राड का साल नज़र आता है। जहां सब एक दूसरे से फ्राड कर रहे थे।

2014 आया। अख़बारों में मोदी जी की प्रशस्ति लिखना काम हो गया। जो प्रशस्ति नहीं लिखा, उसका लिखने का काम बंद हो गया। दो दो एंकरों की नौकरी ले ली गई। कुछ संपादक किनारे कर दिए गए। मीडिया को ख़त्म कर दिया गया। गोदी मीडिया के दौर में मैदान साफ है मगर प्रधानमंत्री पेट्रोल से लेकर रुपये पर बोल नहीं रहे हैं। नोटबंदी पर बोल नहीं रहे हैं। अभी तो मौका है। पहले से भी ज़्यादा कुछ भी बोलने का। नौजवानों को नौकरी ही तो नहीं मिली, भाषण तो मिल ही सकता है। विश्व गुरु का मीडिया भांड हो गया। बेहया हो गया। मीडिया कमज़ोर किया गया ताकि जनता को कमज़ोर किया जा सके। जब एंकर को हटाया जा सकता है तो सवाल पूछने वाली जनता तो दो लाठी में साल भर चुप रहेगी। यही भारत चाहिए था न, यही भारत है ,यहां आपकी आंखों के सामने।

क्या प्रधानमंत्री 2013 के अपने भाषणों से परेशान हैं? या फिर 2019 के लिए उससे भी अच्छा भाषण लिखने में लगे हैं? प्रधानमंत्री तब तक इतना तो कर सकते हैं कि पुराने भाषणों को ही ट्विट कर दें। बोल दें कि जो तब बोला था, वही आज सही है। बार-बार क्या बोलना। आप यह मान कर सुन लें कि यह 2018 नहीं 2013 है। महानायक बार-बार नहीं बोला करते हैं। वे तभी बोलते हैं जब उन्हें सुनाना होता है। तब नहीं बोलते हैं जब उन्हें जवाब देना होता है।

क्या उनका बोला हुआ भाषण उन्हें सता रहा है? कई बार ऐसा होता है। श्री श्री रविशंकर तो एक डॉलर 40 रुपये का करवा रहे थे। पता नहीं वे अपने शिष्यों चेलों का सामना कैसे करते होंगे। रामदेव तो युवाओं को 35 रुपये लीटर पेट्रोल दिलवा रहे थे। अब वे भी चुप हैं। उनका विश्व गुरु भारत चुप है। इसी बुज़दिल इंडिया के लिए रामदेव युवाओं को 35 रुपये लीटर पेट्रोल भरवा रहे थे। अब 86 रुपये प्रति लीटर पर किसी को कोई तकलीफ नहीं है।

प्रधानमंत्री को क्या क्या अचानक याद आ जाता होगा। अचानक याद आ जाता होगा कि अरे गुजरात चुनाव में साबरमती में पानी में उतरने वाला जहाज़ उतारा था, वो दोबारा क्यों नहीं उतरा। कोई पूछ तो नहीं रहा है। चिकोटी काटने लगते होंगे। यार ज़रा पता करो ,पूछने वाले सारे एंकर हटा दिए गए न। कोई बचा है तो उसे भी निकलवा दो। करोड़ों बेरोज़गार हैं इस देश में। नौकरी दे नहीं सका तो क्या हुआ, नौकरी ले तो सकता ही हूं। बाकी आई टी सेल सपोर्ट में तर्क तैयार कर दे। इन्हें अर्बन नक्सल बनवा दो।

सरकार में हर कोई दूसरा टॉपिक खोजने में लगा है जिस पर बोल सकें ताकि रुपये और पेट्रोल पर बोलने की नौबत न आए। जनता भी चुप है। यह चुप्पी डरी हुई जनता का प्रमाण है। इसलिए और भी ख़तरनाक है। वो कमेंट बॉक्स में लिखने लायक नहीं रही। इन बॉक्स में लिख रही है कि हमारी कमाई पेट्रोल पंप पर उड़ रही है। क्या जनता को भी नहीं दिखाई दे रहा है कि पेट्रोल 86 के पार चला गया है? रुपया 71 के पार चला गया है।

जब इन्हीं सवालों पर 2013 में प्रधानमंत्री से पूछा जाता था तब 2018 में क्यों नहीं पूछा जा रहा है। ऐसा क्या हो गया है कि प्रधानमंत्री रुपये की ऐतिहासिक गिरावट पर बोल नहीं पा रहे हैं। राफेल डील पर बोल नहीं पा रहे हैं। रक्षा मंत्री बोलने वाली थीं, मगर उन्हें चुप करा दिया गया। वित्त मंत्री ब्लाग लिख रहे हैं। पता चला कि राफेल पोस्टल विभाग में शामिल हो गया और रविशंकर प्रसाद उस पर डाक टिकट लगा रहे हैं।

डर। डर का सामाजिकरण हुआ है। यह प्रक्रिया पूरी हो गई है। डर ही है कि कहीं कोई सवाल नहीं है। जवाब के बदले डर है। आयकर का दारोगा, थाने का दारोगा आपके घरों में घुस जाएगा। टीवी पर नक्सल नक्सल चल जाएगा। इसलिए सब चुप है। क्या सबको चुप रहने के लिए, डरे हुए रहने के लिए बोलने वाला नेता चाहिए था? फिर बोलने वाले नेता को किस बात का डर है। क्या उन्हें भी अब बोलने से डर लगता है? होता है। कई बार डराते डराते डर ख़ुद के भीतर भी बैठ जाता है। जो डरता है, वही डराता है। जो डराता है, वही डरता है।

ये बुज़दिल इंडिया है। जहां सवाल बंद है। जहां जवाब बंद है। टीवी पर जनवरी से 2019 में मोदी के सामने कौन का प्रोपेगैंडा चल रहा है। जनता के 2018 के सवाल ग़ायब कर दिए गए हैं। जनता भी ग़ायब हो चुकी है। वह भक्त बन गई है या समर्थक बन गई है या पता नहीं क्या बन गई है। जिस भारत में नौकरियां नहीं हैं. लोगों की आमदनी नहीं बढ़ रही है उस भारत में 86 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल ख़रीदने की क्षमता कहां से आ गई है। क्या जनता अब उस हिन्दू मुस्लिम खांचे से बाहर नहीं आ पा रही है, क्या उसे बाहर आने से डर लग रहा है?

बिजनेस स्टैंडर्ड में महेश व्यास ने आज फिर भांडा फोड़ दिया है। इस साल की पहली तिमाही में जीडीपी 8.2 प्रतिशत हो गई। सरकार गदगद हो गई। लेकिन क्या आपको पता है कि रोजगार कितना बढ़ा है?, इसी दौरान रोज़गार में 1 प्रतिशत की कमी आई है। तिमाही की जीडीपी संगठित क्षेत्रों के प्रदर्शन पर आधारित होती है। महेश व्यास का कहना है कि दूसरी तिमाही में भी रोज़गार में तेज़ी से गिरावट आई है। जुलाई 2017 से जुलाई 2018 के बीच काम करने वाले लोगों की संख्या में 1.4 प्रतिशत की गिरावट आ गई है। अगस्त में 1.2 प्रतिशत की गिरावट है। नवंबर 2017 से ही रोज़गार में गिरावट आती जा रही है। जबकि लेबर फोर्स बढ़ती जा रही है। यानी काम के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोग उपलब्ध होते जा रहे हैं। नोटबंदी के बाद लेबर फोर्स सिकुड़ गया था। लोगों को काम मिलने की उम्मीद ही नहीं रही थी इसलिए वे लेबर मार्केट से चले गए। अब फिर से बेरोज़गार लेबर मार्केट में लौट रहे हैं। मगर काम नहीं मिल रहा है।

फिर रोज़गार पर कोई सवाल नहीं है। नौजवान अपना अपना बैनर लिए प्रदर्शन कर रहा है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। जब तक वह हिन्दू मुस्लिम कर रहा था, तब तक वह अपना था, जैसे ही नौकरी मांगने लगा, पराया हो गया। जैसे राजनीति उसे दंगाई बनाना चाहती हो, काम नहीं देना चाहती है। कुतर्कों की बाढ़ आई है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं राजीव कुमार। ठाठ से कहते हैं कि ज़रूरत पड़ी तो वे नोटबंदी फिर करेंगे। अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की ऐसी हेकड़ी कभी नहीं सुनी। इसी नीति आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री मोदी हैं। क्या यह उनका भी मत है? जयन्त सिन्हा कहते हैं कि हवाई जहाज़ का किराया ऑटो से सस्ता हो गया है। क्या सही में ऐसा हुआ है?

कोई कुछ भी बोल देता है मगर सवाल का जवाब नहीं देता है। कुछ भी बोल देता है ताकि बहस होने लगे। ताकि मुद्दे से ध्यान हट जाए। ताकि आप यह न पूछें कि रुपया ऐतिहासिक रूप से नीचे क्यों हैं। पेट्रोल के दाम 86 रुपये प्रति लीटर से अधिक क्यों हैं?